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मजदूरी का जीवन निर्वाह सिद्धांत the subsistence theory

मजदूरी का जीवन निर्वाह सिद्धांत (लोह सिद्धांत)
The subsistence theory / Iron law of wages

• प्रतिपादन : फ्रांस के प्रकृतिवादी अर्थशास्त्रियों द्वारा 
         प्रो. टर्गोट (19 वी सदीं के प्रारंभ )
समर्थन : एडम स्मिथ, माल्थस, रिकार्डो आदि।
• जर्मन अर्थशास्त्री लेसेल (Lassalle) : मजदूरी का लोह सिद्धांत

सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार मजदूरी की दर श्रमिकों के जीवन निर्वाह व्यय के समान होने की प्रवृत्ति रखती है ।
अर्थात श्रमिकों को इतनी मजदूरी अवश्य दी जानी चाहिए जिससे कि वह अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को संतुष्ट करके जीवित रह सकता है।

मान्यताएं : Assumptions 
• जनसंख्या में तीव्र वृद्धि 
• कृषि में उत्पत्ति हास नियम क्रियाशील
• रोजगार की कुल मात्रा निश्चित
• मजदूरी की दर दीर्घकाल में जीवन निर्वाह के न्यूनतम स्तर से अधिक अथवा कम नहीं हो सकती।
• श्रम शक्ति एक सामान्य वस्तु के समान जिसका मालिकों और श्रमिकों के मध्य क्रय-विक्रय होता है।

सिद्धांत की व्याख्या :
1.मजदूरी जीवन निर्वाह व्यय से कम होने पर –
श्रमिक अपना तथा अपने परिवार का पालन पोषण नहीं कर पाएंगे जिससे लोगों में भुखमरी बढ़ेगी , मृत्युदर बढ़ेगी। श्रमिक विवाह नहीं कर पाएंगे जिससे जनसंख्या में कमी होगी । जनसंख्या कम होने से श्रम बाजार में श्रमिकों की पूर्ति दीर्घकाल में कम होगी । श्रमिकों की पूर्ति कम होने से मजदूरी बढ़ने लगेगी और पुनः जीवन निर्वाह व्यय के बराबर हो जाएगी।
2.मजदूरी जीवन निर्वाह व्यय से अधिक होने पर :
मजदूरी अधिक होने पर श्रमिकों की जनसंख्या में वृद्धि होगी । 
जनसंख्या बढ़ने से उपलब्ध कार्य के लिए प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी जिससे मजदूरी दर कम होकर पुनः जीवन निर्वाह व्यय के बराबर हो जाएगी।

आलोचनाएं /कमियां/ दोष : Criticism
• जीवन निर्वाह व्यय को मापना कठिन 
• मजदूरी उनकी आवश्यकताओं के अनुसार क्यों नहीं होनी चाहिए 
• मांग पक्ष की पूर्ण उपेक्षा 
• विभिन्न व्यवसायों में मजदूरी की दर अलग-अलग क्यों का स्पष्टीकरण नहीं 
• श्रमिक संघ की उपेक्षा 
• व्यावहारिक जीवन में लागू नहीं 
• श्रमिकों की कार्य क्षमता की उपेक्षा 
• माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत पर आधारित होने से उस सिद्धांत की मान्यताओं का इसमें समावेश

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