शुम्पीटर का आर्थिक विकास सिद्धांत
Schumpeter’s theory of Economic Development
• Book : Theory of Economic Development 1911
• Joseph A. Schumpeter : German Economist
शुम्पीटर पूँजीवादी प्रणाली (Capitalist Economy) के समर्थक व प्रशंसक थे । उन्होंने पूंजीवाद के उदभव, इसकी कार्यप्रणाली एवं विकास की गहन पड़ताल की ।
1. आर्थिक विकास का चक्र : चक्रीय प्रवाह
Cycle of Economic Development : Circular Flow
• आर्थिक विकास के चक्र को चक्रीय प्रवाह (Circular Flow) के द्वारा समझाया
• चक्रीय प्रवाह स्थिर संतुलन (Steady state) का आधार है
इसकी मुख्य प्रवृतियाँ निम्नांकित हैं: मान्यताएं
ये प्रवृतियाँ शुम्पीटर के विश्लेषण का आधार है ।
(I).स्थिर संतुलन की दशा : Steady state
यह माना गया है कि पूर्ण प्रतिस्पर्धी संतुलन विद्यमान है, कोई लाभ नहीं, ब्याज दरें नहीं हैं, कोई बचत नहीं, कोई विनियोग नहीं एवं अनैच्छिक बेरोजगारी नहीं इस संतुलन को शुम्पीटर ने चक्रीय प्रवाह कहा ।
(ii) मांग एवं पूर्ति समान (D = S)
चक्रीय प्रवाह में, समान वस्तुएँ समान तरीके से हर वर्ष उत्पादित की जाती हैं । सभी उत्पादक वस्तुओं की समय माँग की जानकारी रखते है और इसी के अनुसार उत्पादन की पूर्ति को समायोजित करते है । (D=S)
(iii) उत्पादन का अनुकूलतम स्तर विद्यमान
Optimum level of production
अर्थव्यवस्था में संसाधनों की बरबादी की कोई संभावना नहीं है ।
(iv) फर्में प्रतिस्पर्धात्मक संतुलन की दशा (अनुकूलतम आकार)
Perfect competitive equilibrium (Optimum size)
उत्पादन के साधनों को उनके सीमांत उत्पाद के अनुसार भुगतान किया जाता है
चक्रीय प्रवाह को तोड़ना : Breaking the Circular flow
इस दशा को विकास हेतु प्रावैगिक Dynamic एवं संगतिपूर्ण बनाने के लिए प्रवाह प्रणाली में परिवर्तन लाने आवश्यक होंगे । शुम्पीटर के अनुसार- व्यवसाय में असीमित अवसर होते है जिनका उद्यमी विदोहन करता है । इस द्वितीय प्रकिया की शुरुआत नवप्रवर्तन के द्वारा होती है ।
2.आर्थिक विकास में उद्यमी की भूमिका
Role of Entrepreneur in Economic Development
आर्थिक विकास की प्रक्रिया में उद्यमी की भूमिका महत्वपूर्ण मानती है और विकास के रंगमंच में उसे प्रमुख पात्र बनाती है ।
नवप्रवर्तक एवं नवप्रवर्तन The Innovator and Innovation
• शुम्पीटर ने विकास प्रक्रिया को स्वाभाविक एवं अनियमित परिवर्तनों (discontinued changes) से संबंधित किया । यह पूर्व में विद्यमान संतुलन की दशा को बदलती है ।
• उच्च अंश के जोखिम एवं अनिश्चितता वाले विश्व में दृढ़ इच्छा शक्ति एवं कार्य की योग्यता व कुशलता रखने वाला व्यवसायी ही नवप्रवर्तन की क्रिया सम्पन्न करता है अर्थात् नवप्रवर्तक नवप्रवर्तन कर उपक्रमों की स्थापना करता है तथा लाभ (Profit) के अवसरों का विदोहन करता है ।
उद्यमी या नवप्रवर्तक
• लाभ की लालसा (Profit or Wealth)
• व्यवसाय जगत में सृजन के सुख (Enjoy)
• विशिष्ट पहचान (Superiority) बनाने के वृहत्तर लक्ष्य की सोच
इस प्रकार नवप्रवर्तक विकास का एजेंट है । उसकी अपनी सोच, कल्पनाएँ एवं विचार को कार्य रूप में बदलने की क्षमताएँ हैं । वह नए प्रयोग करता है, नये आविष्कार करता है । वह संसाधनों के नवीन संयोग प्रस्तुत करता है जिनसे तकनीकी परिवर्तन ( Technology changes) होते हैं ।
नवप्रवर्तन के 5 रूप
(a) एक नवीन वस्तु का परिचय जिससे उपभोक्ता परिचित जानकारी नहीं है । New Product
(b) उत्पादन की एक नई विधि का परिचय New Methods of production
(c) एक नये बाजार का उदय : New market
(d) कच्चे पदार्थ की आपूर्ति के एक नये स्रोत की खोज New sources of raw material
(e) एक उद्योग में एक नये संगठन का परिचय New industrial organisation
• विकास की पहली लहर नवप्रवर्तन युक्त विनियोग (Investment) की दशा है
• दूसरी लहर अनुकरण (Follower) विनियोग की चलती है जो पहली लहर में समावेशित हो जाती है ।
3.साख की भूमिका Role of Credit
चक्रीय प्रवाह तोड़ने का आवश्यक अस्त्र
आर्थिक विकास हेतु साख (Credit) आवश्यक है । साख अशोधित संसाधनों व अप्रयुक्त तकनीकी ज्ञान के भण्डार का विदोहन संभव बनाता है साख के द्वारा नवप्रवर्तक उत्पादन के संसाधनों का क्रय करता है जो नए प्रयोगों एवं नवप्रवर्तन हेतु महत्वपूर्ण होते हैं ।
साख :
• चालू आय से प्राप्त बचते (विनियोग कोष)
• बैंकिंग प्रणाली द्वारा सम्पन्न साख का सृजन
नवप्रवर्तक बैंको द्वारा सृजित साख द्वारा अपने व्यवसाय का विस्तार करते है । साख सृजन सुविधाओं का विस्तार पूँजी संचय (Capital accumulation) का एक महत्वपूर्ण साधन ।
4. आर्थिक विकास की विभिन्न अवस्थाएं
Thanks
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें