सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वास्तविक शेष प्रभाव, पेटिनकिन का मौद्रिक सिद्धांत , Real Balance Effect: Patinkin's Monetary theory


वास्तविक शेष प्रभाव : The Real Balance Effect 
पेटिनकिन का मौद्रिक सिद्धांत: Patinkin's Monetary Theory

• Don Patinkin डॉन पेटिनकिन
• Book : Money, interest and prices (1956)

Meaning of Real Balance : वास्तविक शेष का अर्थ
लोगों के नकदी धारण के स्टॉक की वास्तविक क्रय शक्ति
   Means the real purchasing power of the stock of  cash holdings of the people.

Real Balance Effect : वास्तविक शेष प्रभाव
जब कीमत स्तर में परिवर्तन होता है तो इससे लोगों के नकदी धारण की क्रयशक्ति प्रभावित होती हैं जिससे आगे वस्तुओं की मांग एवं पूर्ति प्रभावित करती हैं।
 कीमत स्तर में कमी से नकद शेष का वास्तविक मूल्य बढ़ जाता है जिससे व्यय बढ़ता है और परिणाम स्वरूप अर्थव्यवस्था में आय, उत्पादन और रोजगार में वृद्धि होती हैं।
When the price level changes it affects the purchasing power of people’s cash holdings which in turn affects the demand and supply of goods.

सिद्धांत का आधार  Basis of theory
 समरूपता एवं द्वि-विभाजन परिकल्पना की आलोचना
  Criticises  for Homogeneity and dichotomy hypothesis




(I) Homogeneity Hypothesis : समरूपता परिकल्पना
 वस्तुओं की मांग और पूर्ति केवल सापेक्ष कीमतों से प्रभावित होती हैं अर्थात यदि मुद्रा की मात्रा दोगुनी कर दी जाए तो कीमतों का वस्तुओं की मांग और पूर्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
Demand & supply of goods are pretentious only by relative prices. it means that if doubling of money, prices will have no effect on the demand and supply of goods.
(ii)  Dichotomy Hypothesis : द्वि-विभाजन परिकल्पना
सापेक्षिक कीमत स्तर को वस्तुओं की मांग तथा पूर्ति निर्धारित करती हैं और निरपेक्ष कीमत स्तर को मुद्रा की मांग तथा आपूर्ति निर्धारित करते हैं।
The relative price level is determined by the demand and supply of goods
The absolute price level is determined by demand and supply of money.

Conclusion : दोनों परिकल्पनाएं बताती है कि  कीमत स्तर न तो वस्तु बाजार को प्रभावित करता है और ना ही मुद्रा बाजार को।
पेटिनकन ने उपरोक्त दोनों मान्यताओं का खंडन करने के पश्चात मुद्रा बाजार (Money Market) तथा वस्तु  बाजार (Goods) का एकीकरण (together) करता है जो सापेक्ष कीमतों (Relative Prices) तथा वास्तविक शेषो (Real Balances) पर निर्भर करते हैं।
यदि कीमत स्तर (P) बढ़ेगा तो इससे लोगों का वास्तविक शेष (क्रयशक्ति) कम हो जाएगी जिससे वे कम खर्च करेंगे,वस्तुओं की मांग (D) कम होगी, कीमत स्तर (P) कम हो जाएगा & विलोमश:

Assumptions (मान्यताएं)
• अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार : Full Employment
• उपभोग फलन (C.F.) स्थिर Constant : APC & MPC 
• उपभोग (C) पर वितरण प्रभाव (Distribution effect)नहीं
• लोगों का उपभोग व्यवहार वास्तविक रूप पर निर्भर
Consumption depends on Real term
• अर्थव्यवस्था में द्वि-विभाजन नहीं : No Dichotomy 
• मुद्रा तटस्थ : Neutral Money
• मुद्रा भ्रांति का अभाव : Absence of money illusion

वास्तविक शेष प्रभाव निम्न बातों की व्याख्या करता है
1.क्लासिकी द्वि-विभाजन को हटाना : Invalid Dichotomy
 मुद्रा बाजार तथा वास्तविक क्षेत्र (Monetary & Real sector) का एकीकरण
 किसी वस्तु की मांग (Demand for goods) निम्न दो तत्वों पर निर्भर
• वास्तविक शेषों का स्टॉक M/P 
• सापेक्ष कीमत स्तर Relative Price level
वास्तविक शेष प्रभाव (Real Balance Effect) को सामान्य संतुलन विश्लेषण (General Equilibrium Analysis) में शामिल
अर्थव्यवस्था के सभी बाजार सापेक्ष कीमतों (Relative prices) के संतुलन मूल्य, ब्याज की दर (r) निरपेक्ष कीमत स्तर (Absolute Price) का एक साथ निर्धारण 
निरपेक्ष कीमतें (Absolute Prices) वास्तविक शेष प्रभाव के माध्यम से वस्तु बाजारों को और अंततः सापेक्ष कीमतों (Relative Prices) को प्रभावित करती है।

2.फिशर के सिद्धांत के निष्कर्षों की पुष्टि : Fisher’s quantity theory of money
 मुद्रा तटस्थ (money is neutral) होती हैं और ब्याज दर (r) वास्तविक शेष प्रभाव द्वारा मुद्रा की मात्रा (M) से स्वतंत्र
वास्तविक शेष का मतलब है कि लोगों में मुद्रा के संबंध में भ्रांति (Money illusion) नहीं होगी वह केवल मुद्रा के वास्तविक मूल्यों को देखते हैं कि उससे क्या खरीदा जा सकता है ?अर्थात्  मुद्रा परिमाण दोगुना होने पर कीमत स्तर भी दोगुना होगा लेकिन सापेक्ष कीमतें एवं वास्तविक शेष स्थिर रहेगा और अर्थव्यवस्था का संतुलन नहीं बदलेगा।

3.दीर्घकाल में पूर्ण रोजगार मजदूरी-कीमत लोचशीलता द्वारा,  
Full employment in long run determined by flexibility of wages and prices
केंजीय अल्परोजगार संतुलन असंतुलन स्थिति होती हैं।
Keynesian underemployment equilibrium is condition of Disequilibrium

YouTube channel : Study 24 Udaipur




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Keynesian theory of money and prices , प्रो. कीन्स का मुद्रा तथा कीमतों का सिद्धांत

The Keynesian theory of money and prices मुद्रा तथा कीमतों का केंजीय सिद्धांत (प्रो. कीन्स) आधार : मुद्रा परिमाण के प्रतिष्ठित सिद्धांत की कमियां • क्लासिकी द्वि-विभाजन (dichotomy) : मुद्रा सिद्धांत तथा कीमत सिद्धांत अलग-अलग • मुद्रा के परिमाण तथा कीमतों में प्रत्यक्ष एवं आनुपातिक संबंध Direct and proportional relation between quantity of Money & prices • मुद्रा की तटस्थता Neutrality of money : स्थैतिक संतुलन Static Equilibrium प्रो. कींस के अनुसार : According to Keynes • मुद्रा सिद्धांत एवं कीमत सिद्धांत का एकीकरण Integration     वास्तविक एवं मौद्रिक क्षेत्रों (Real & Monetary sector) का  • मुद्रा की मात्रा में वृद्धि से कीमतों में वृद्धि लेकिन मुद्रा की मात्रा एवं कीमतों में अप्रत्यक्ष संबंध increase in prices due to increase in in quantity of money indirect relationship between quantity of money and prices मान्यताएं : Assumptions • उत्पादन के साधनों की पूर्ति  लोचदार (बेरोजगारी की स्थिति में) Supply of factors of...

सार्वजनिक व्यय के प्रभाव , effects of government expenditure

सार्वजनिक व्यय के प्रभावों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है – 1. सार्वजनिक व्यय का उत्पादन पर प्रभाव  2. सार्वजनिक व्यय का वितरण पर प्रभाव  3. सार्वजनिक व्यय का आर्थिक जीवन पर प्रभाव  1.सार्वजनिक व्यय का उत्पादन पर प्रभाव  प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का प्रत्येक व्यय उत्पादक होता है । सामान्यतः औद्योगिक विकास पर जो भी किया जाता है उससे उत्पादन बढ़ता है किंतु सामाजिक सेवाओं पर किया गया व्यय भी लोगों की कार्यकुशलता बढ़ाकर अप्रत्यक्ष रूप से उत्पादन बढ़ाता है ।  प्रोफेसर डॉल्टन ने सार्वजनिक व्यय के उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभावों को तीन भागों में विभाजित किया है – • कार्य करने एवं बचत करने की योग्यता पर प्रभाव  • कार्य करने एवं बचत करने की इच्छा पर प्रभाव  • विभिन्न क्षेत्रों एवं रोजगार में साधनों के स्थानांतरण पर प्रभाव  A.कार्य करने एवं बचत करने की योग्यता पर प्रभाव  सार्वजनिक व्यय कई प्रकार से कार्य करने की योग्यता को बढ़ा सकता है - • क्रयशक्ति में वृद्धि के द्वारा  : लोगों को वेतन, मजदूरी, पेंशन, भत्ते एवं अन्य भुगतान...

मौद्रिक नीति : अर्थ, आवश्यकता, उद्देश्य,उपकरण , मौद्रिक नीति के उपकरण अथवा रीतियां

मौद्रिक नीति वर्तमान समय में मौद्रिक नीति आर्थिक स्थिरीकरण का एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। मौद्रिक नीति का आशय एक देश के केंद्रीय बैंक भारत में रिजर्व बैंक द्वारा साख नियंत्रण हेतु उपाय अपनाए गए उपायों से है‌‌। मुद्रा तथा साख की पूर्ति का एक निर्धारित स्तर बनाए रखने के लिए जो नीति अपनाई जाती हैं उसे मौद्रिक नीति कहा जाता है। मौद्रिक नीति की आवश्यकता • बेरोजगारी की मात्रा में निरंतर वृद्धि • राष्ट्रीय आय , लोगों के रहन-सहन, उपभोग स्तर, बचत शक्ति तथा विनियोग की प्रवृत्ति में वृद्धि से स्फीतिक वातावरण उत्पन्न होता है । इसे रोकने के लिए मौद्रिक नीति की आवश्यकता होती हैं। • वस्तुओं की कीमतों में निरंतर वृद्धि को रोकने के लिए • आर्थिक विकास की योजनाओं के कारण आयतों में निरंतर वृद्धि से भुगतान संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव जिससे अंतरराष्ट्रीय भुगतानों की समस्या उत्पन्न होती हैं और इसे हल करने के लिए उपयुक्त मौद्रिक नीति की आवश्यकता है। मौद्रिक नीति के उद्देश्य • रोजगार की स्थाई एवं उच्च स्तरीय स्थिति बनाए रखना • कीमतों में स्थिरता बनाए रखना • विनिमय दरों में स्थिरता बनाए रखना • आर्थिक विकास क...